May 9, 2026

गधे-खच्चरों का मेला, फ़िल्मी हीरो-हीरोइन के नाम से बिकते हैं

सतना। गधे-खच्चरों के मेले की बात सुनकर चौंक गए न आप भी…! जी हाँ, बात ही ऐसी है। आपने कई तरह के मेले की बात सुनी होगी लेकी न आज हम आपको सैर कराएंगे गधों के मेले की। यह मेला बीते तीन सौ सालों से यहाँ भरता आ रहा है। ये सिर्फ़ गधे नहीं हैं, बल्कि इनके नाम बालीवुड के स्टायलिश सितारों के नाम पर हैं और बकायदा इन्हें इन्हीं नामों से पहचाना जाता है। इनकी बोली लाखों रूपये में लगती है।

सतना जिले की धार्मिक नगरी चित्रकूट में गधों का मेला करीब 300 सालों से लगातार लग रहा है, मुगलकाल में इसकी शुरुआत हुई थी। हर साल दीपावली के दूसरे दिन से तीन दिनों तक गधों का मेला सजता है। यहाँ दूर-दूर से व्यापारी गधे और खच्चर लेकर आते हैं। मेले में इनकी बोली लगती है और हजारों की संख्या में गधों-खच्चरो की खरीद-फरोख्त होती है। गधा व्यापारी यहाँ लाखों का व्यापार करते है। उन्हें मेले में कभी घाटा तो कभी मुनाफा होता रहता है।

गधा मेले की दिलचस्प बात यह है कि गधों और गधी के नाम फ़िल्मी सितारों के नाम पर रखे जाते हैं। जो सितारा बालीवुड में जितना बड़ा होता है, उस नाम के मान से उसकी कीमत भी ज़्यादा होती है। यहाँ सलमान, शाहरुख, गोविंदा, मिथुन, दीपिका, कटरीना और ऐश्वर्या के नाम पर इनके नाम होने से भी व्यापारी ज़्यादा कीमत देते है। हालाँकि बोली नस्ल, रंग और ब्रीड के मुताबिक देखकर ही गधों की कीमत लगाई जाती है।

चित्रकूट में मुगल शासक औरंगजेब की छावनी थी। उसके लश्कर ने इसी मैदान ने पड़ाव डाला था।लश्कर के घोड़े अचानक किसी बीमारी से मरने लगे, उसकी सेना में घोड़ो की कमी हो गयी तब औरंगजेब ने यहाँ घोड़ो, गधों और मालवाहक जानवरो का बाज़ार लगाया था। अफगानिस्तान और अन्य देशों से व्यापारी उस समय अच्छी नस्ल के घोड़े, गधे और खच्चर यहाँ लाए थे। तब से यह परंपरा आज भी जारी है। मंदाकिनी नदी के किनारे लगने वाले इस वार्षिक गधा मेले में कभी व्यापारी साल भर की रोजी-रोटी के लायक कमा लेते थे।

लेकिन अब शासन-प्रशासन की अनदेखी और आधुनिकता के चलते मप्र-उप्र की सरहद पर लगने वाला यह ऐतिहासिक मेला अपना वजूद खोता जा रहा है। मशीनरी के चलन और सरकार की बेरुखी से इसका वजूद खत्म होता जा रहा है। चित्रकूट नगर पंचायत इस मेले की व्यवस्था करता है और राजस्व वसूलता है। वैश्विक मंदी के चलते इस बार के मेले में कोई खास कमाई नहीं हो पाई. प्रशासनिक अनदेखी से ठेकेदार, व्यापारी और खरीदार अपनी-अपनी परेशानियाँ बता रहे हैं।

Written by XT Correspondent

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