May 9, 2026

भूखे पेट सोने को मजबूर हो रहे मछुआरे

जबलपुर। तमाम सरकारी घोषणाओं के बावजूद ज़मीनी स्तर पर मछुआरों को कोई फौरी मदद नहीं मिल सकी है।ये समाज बीते तीन महीनों से हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं और अब आगे दो महीने मछलियों का प्रजनन काल होने से काम नहीं हो सकेगा। इन हजारों परिवारों के सामने अब रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। आखिर ये लोग अपने  परिवार का पेट कैसे भरे?

दरअसल 24 मार्च की मध्यरात्रि से घोषित लॉकडाउन के कारण प्रदेश के 2 लाख 2 हजार मछुआरों की आमदनी बंद हो गई। इसका उनके जीवन पर विपरीत असर हो रहा है। मछुआरों के सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया है। मछुआरों की इस कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए मछुआ कल्याण एवं मत्सय विभाग मध्यप्रदेश ने 31 मार्च 2020 को मत्स्याखेट, मत्सय परिवहन, मत्सय विक्रय आदि व्यवस्था सुचारू रखने हेतु नियमानुसार अनुमति दिये जाने हेतु समस्त कलेक्टर को पत्र लिखा था। इस आदेश के तारतम्य में बरगी जलाशय के मछुआरों ने मंडला, सिवनी कलेक्टर और सबंधि क्षेत्र के विधायकों को पत्र लिख कर मत्स्याखेट कार्य शुरू करने हेतू आग्रह किया था। लेकिन राज्य मत्सय महासंघ और ठेकेदार द्वारा आज तक मत्स्याखेट कार्य शुरू नहीं किया गया है। जबकि 15 जून से 15 अगस्त तक सरकारी आदेशों के कारण मत्स्याखेट कार्य बंद कर दिया जाता क्योंकि उक्त समय मछली का प्रजनन काल होता है। ऐसे में विभागीय आदेश के बाद भी मछुआरा लगभग साढ़े चार महीने मत्स्याखेट कार्य से वंचित हो जाएगा। 5 मार्च को मंडला में आयोजित क्षेत्रीय मछुआरा बैठक के बाद कलेक्टर के माध्यम से राज्य सरकार से पत्र लिखकर मांग किया गया था कि प्रत्येक मछुआर सदस्य को बंद ऋतु में दो महीने के लिये 10 हजार रूपये की सहायता राशि दिया जाए।

बता दे कि मध्यप्रदेश राज्य मत्सय महासंघ 2 हजार हैक्टर से बड़े 18 जलाशयों में मत्सय पालन एवं प्रबंधन का कार्य करता है। जिसका कुल क्षेत्रफल 2 लाख 8 हजार हैक्टर है। जिसका मुख्य उद्देश्य मत्सय विकास तथा संबद्ध मछुआरों एवं उनके परिवारों की समाजिक आर्थिक उन्नति करना है। महासंघ की 2015 के रिपोर्ट अनुसार इन 18 जलाशयों 201 पंजीकृत प्राथमिक मछुआ सहकारी समितियां महासंघ की सदस्य हैं। जिसमें कार्यशील मछुआरों की संख्या 6 हजार 523 बताया गया है। जबकि 16 हजार हैक्टर वाली बरगी जलाशय में मछुआरा सदस्यों की संख्या 2038 है। बहुत सारे स्थानिय मछुआरा मत्स्याखेट तो करते हैं परन्तु प्राथमिक मछुआरा समिति में उनका नाम दर्ज नहीं होता है, जिसे स्थानीय भाषा में लोकल मछुआरा कहा जाता है जो सरकारी योजनाओं से वंचित रहता है।  इस कारण कार्यशील मछुआरों की संख्या कम दिखता है।

गौरतलब है कि सबसे पहले बरगी जलाशय में ठेकेदारी प्रथा के खिलाफ 1992 में मछुआरों ने 50 किलोमीटर रैली निकाल कर विरोध दर्ज किया था। जिसके बाद 1993 में राष्ट्रपति शासन के दौरान तत्कालीन राज्यपाल कुंवर महमूद अली खान ने आखेटीत मछली के 20 प्रतिशत हिस्से पर मछुआरा का मालिकाना हक घोषित किया था। साथ ही मछुआरों की प्राथमिक समिति गठित करने का आदेश सहकारिता विभाग को दिया था। जिसके कारण बरगी जलाशय में 54 प्राथमिक समितियों का गठन हो पाया। 1994 में दिग्विजय सिंह सरकार ने बरगी जलाशय में मत्स्याखेट एवं विपणन का अधिकार 54 प्राथमिक सहकारी समितियों के फेडरेशन को 5 सितंबर 1994 को सौंप दिया। अनुभव की कमी, विभागीय अड़ंगे और विधान सभा के हर सत्र में फेडरेशन को लेकर लगातार पुछे गए सवाल का जबाब देते हुए 1994 से 2000 तक इन 6 सालों में औसत 450 टन का उत्पादन प्रति वर्ष, 319।94 लाख मछुआरों को पारिश्रमिक भुगतान, 1 करोड़ 37 लाख राज्य सरकार को रायल्टी, मछुआरों बिना ब्याज के नाव जाल हेतु ऋण, लगभग 100 विस्थापितो को इस कारोबार में रोजगार आदि दिया गया था।

बरगी माडल के आधार पर  तवा जलाशय में मत्स्याखेट एवं विपणन का अधिकार स्थानीय प्राथमिक मछुआरा सहकारी समिति के फेडरेशन को दिया गया था। शुरू से इस निर्णय का विरोध करने वाले ठेकेदार, नेता और नौकरशाह ने साज़िश कर इस अभिनव प्रयोग को खत्म कर फिर  ठेकेदारी प्रथा कायम कर दिया। नेता और नौकरशाह का ठेकेदारों के साथ रिश्ते जग-जाहिर हैं। ठेकेदारी प्रथा में औसत उत्पादन 175-200 टन के बीच रह गया है परंतु इस गिरते उत्पादन को लेकर विधानसभा में कोई सवाल नहीं उठाता है। बरगी फेडरेशन पर मुख्य आरोप यही था कि राज्य की निर्धारित उत्पादन क्षमता से बहुत ही कम उत्पादन है।

उल्लेखनीय है कि 2007 में मुख्य सचिव मध्यप्रदेश शासन की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया कि मत्स्याखेट और विपणन कार्य मछुआरों की प्राथमिक समितियां करेगी और इन समितियों का जलाशय स्तर पर युनियन का गठन किया जाएगा। मत्स्याखेट में संलग्न मछुआरों को पारिश्रमिक के अतिरिक्त मत्सय विपणन से प्राप्त लाभ का लाभांश भी दिया जाएगा। इन निर्णयों बाद भी सभी जलाशयों में ठेकेदारी प्रथा जारी है। राज्य महासंघ और बरगी  ठेकेदार के बीच 2018 में हुए अनुबंध के अनुसार कतला चार किलो से बड़ा पकड़ने पर पारिश्रमिक 28 रूपये प्रति किलो की दर से भुगतान निर्धारित किया गया है। जबकि राजस्थान सरकार द्वारा जारी  2019 के आदेशानुसार मेजर कार्प कतला 5 किलो का दर 148 रूपये प्रति किलो निर्धारित किया गया है। इसी तरह अन्य प्रजाति की मछली पकड़ने की पारिश्रमिक दर 28 रूपये प्रति किलो से भी कम है। कम दर देकर राज्य मत्सय महासंघ मछुआरों की आर्थिक हालात और कमजोर कर रही है।

महासंघ को प्रदेश में जलाशय विकास, मछुआरा विकास और सहकारीता विकास को मजबूत करना था लेकिन महासंघ ने ठेकेदारी प्रथा को ही बढावा दिया है। इन नीतियों के कारण प्राथमिक सहकारी समिति और जलाशय स्तर का फेडरेशन निष्क्रिय हो गया है। मत्सय बीज़ संचय में पूर्ण पारदर्शिता नहीं होने से उत्पादन लगातार घट रहा है। जिससे रोजगार के लिए मछुआरों का भारी संख्या में पलायन हो रहा है। बिडंबना यह है कि मत्स्याखेट कार्य के लिए उपयोग किया जाने वाला नाव और जाल स्वयं ही खरीदना होता है और कभी-कभी जाल डालने के बाद मछली नहीं मिलने पर खाली हाथ लौटना पड़ता है। जाल छह माह में खराब हो जाता है जो काफी महंगा होता है।

मछुआरों के लिए बनाया गया कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी सही ढंग से और सभी को नहीं मिल पाना एक बड़ा कारण है। ठेकेदार लाभ प्राप्त करने के लिए जलाशय का अधिक से अधिक दोहन करता है और मछुआरों को छोटी साइज की प्रतिबंधित मछली पकड़ने के लिए प्रेरित करता है। ठेकेदार के सुरक्षा गार्ड द्वारा मछुआरों के साथ मारपीट करना आम बात है और राज्य मत्सय महासंघ मछुआरों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ मौन रहता है। शोषित होने का मुख्य कारण मछुआरों का असंगठित है।

Written by XT Correspondent

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