भोपाल। मप्र में कमलनाथ सरकार के लिये संजीवनी साबित होगा झाबुआ उपचुनाव का परिणाम। प्रदेश में बहुमत से सिर्फ एक सीट पीछे रह गई है अब कांग्रेस। 230 सदस्यों वाली मप्र विधानसभा में अब कांग्रेस के 115 विधायक हो गए है। इस बीच मप्र की सियासत में एक बार फिर दिग्विजय सिंह की पकड़ मजबूत हुई है क्योंकि कांतिलाल भूरिया मूल रूप से दिग्विजय सिंह की पाठशाला से निकले हुए नेता है और इस उपचुनाव में उनकी उम्मीदवारी भी दिग्विजय सिंह के दबाब औऱ गारंटी पर ही फाइनल की गई थी। कांतिलाल की जीत सरकार के स्थायित्व के समानांतर काँग्रेस की आंतरिक खेमेबाजी के लिहाज से भी दिग्विजय सिंह को सिंधिया औऱ कमलनाथ पर बीस साबित करने वाला चुनावी नतीजा भी है।
कांतिलाल भूरिया मप्र के बड़े आदिवासी नेताओं में शुमार होते है वे पांच बार झाबुआ से सांसद औऱ केंद्र में कृषि राज्य मंत्री रह चुके है। मप्र कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में भी कांतिलाल की पहचान आदिवासी फेस के रूप में है। इस उपचुनाव का महत्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिये इस आधार पर भी अधिक है कि उन्हें तुलनात्मक रूप से राजनीतिक चुनौती बीजेपी की जगह कांग्रेस में सिंधिया खेमे से मिलती रही है।
पिछले कुछ दिनों से ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार कमलनाथ सरकार को निशाने पर ले रहे है। इससे पहले पीसीसी चीफ को लेकर मप्र कांग्रेस में कमलनाथ, दिग्विजय, औऱ सिंधिया खेमों के बीच जबरदस्त खींचतान ने मप्र में सरकार की स्थिरता औऱ कमलनाथ के नेतृत्व को कटघरे में खड़ा कर रखा था। सरकार गठन के साथ ही पर्दे के पीछे से दिग्विजय सिंह कमलनाथ की ढाल बनकर खड़े रहे है दोनों का युग्म सिंधिया के विरुद्ध है और किसी कीमत पर दोनों सीनियर नेता नही चाहते है कि मप्र में एक नया राजनीतिक शक्तिकेन्द्र स्थापित हो।
दोनो नेताओ की युगलबंदी ने ही झाबुआ उपचुनाव की व्यूरचना तैयार की। प्रत्याशी चयन के मामले से लेकर चुनाव प्रबंधन तक हर मामले में दिग्विजय सिंह का प्रभाव इस उपचुनाव में साफ दिखाई दिया। कांतिलाल की निष्ठा शत प्रतिशत दिग्विजय सिंह के प्रति है यह सर्वविदित है, मुख्यमंत्री कमलनाथ के पास इस क्षेत्र में कोई विश्वनीय चेहरा इसलिये नहीं है क्योंकि वे मप्र की सियासत में दिग्विजय की तरह न तो सक्रिय रहे है औऱ न ही उनका व्यक्तिगत प्रभाव पूरे मप्र में है। इस उपचुनाव में कांतिलाल की राह में सबसे बड़ा अवरोध जेवियर मेडा थे जो यहां से 2013 में विधायक थे और 2018 में उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़कर कांतिलाल भूरिया के डॉक्टर बेटे विक्रांत को हराने की पटकथा लिख दी थी। दिग्विजय सिंह ने ही जेवियर मेडा को मैनेज किया, चुनाव परिणाम से यह स्पष्ट भी है।
असल में कांतिलाल को टिकट दिलाकर औऱ फिर जिताने का महत्व दिग्विजय सिंह के लिये भी इस मायने में महत्वपूर्ण है कि पिछले दिनों वनमंत्री उमंग सिंघार ने दिग्विजय सिंह के विरुद्ध मर्यादाओं की सभी सीमाएं लांघकर अनर्गल बयानबाजी की थी। तब इस मामले में उमंग को सिंधिया का साथ मिला था सिंधिया ने सार्वजनिक रुप से कहा था कि जो आरोप उमंग ने लगाए है उनकी सुना जाना चाहिये, इसे इसलिए भी बड़ा बयान माना गया था क्योंकि उमंग पिछले काफी समय से सिंधिया के प्रभाव में है और वे ग्वालियर जिले के प्रभारी मंत्री भी सिंधिया की पसन्द से बनाये गए है जबकि ग्वालियर से कभी उनका कोई राजनीतिक रिश्ता नही रहा है।
राजनीतिक जानकर मानते है कि दिग्विजय सिंह सियासत में अपने विरोधियों को बड़े करीने औऱ शांतचित्त होकर ठिकाने लगाते है। उमंग सिंघार के जरिये उन पर जिस अतिशय आपत्तिजनक आरोप लगाए गए थे उनका जबाब अब कांतिलाल भूरिया के जरिये दिया गया है।
उमंग मप्र की बड़ी आदिवासी नेता जमुनादेवी के भतीजे है दिग्गिराजा जब सीएम हुआ करते थे तब जमुना देवी आये दिन उन्हें आंखे दिखाया करती थी लेकिन पूरी राजनीतिक शालीनता को बरकरार रखते हुए दिग्विजय सिंह ने मप्र के मालवा निमाड़ में नया आदिवासी नेतृत्व खड़ा कर मप्र की राजनीति से जमुनादेवी के प्रभाव को खत्म प्रायः कर दिया था। कांतिलाल भूरिया भी इसी रणनीतिक जमावट के प्रतिनिधि है इसलिए समझा जा सकता है कि मप्र की सियासत में अब दिग्विजय सिंह कांतिलाल के जरिये किस दूरगामी निशाने को भेद चुके है।
स्वाभाविक है कि कांतिलाल मप्र सरकार में मंत्री बनाए जाएंगे या फिर परम्परागत आदिवासी वोट बैंक को साधने के लिये उन्हें पीसीसी चीफ की कुर्सी भी फिर से सौंपी जा सकती है। दोनों ही स्थितियों में दिग्विजय सिंह का प्रभाव मप्र की सियासत में फिर से उनके बाहर औऱ भीतर के विरोधियों को स्वीकार करना ही पड़ेगा। दूसरी तरफ कमलनाथ इस नतीजे से इसलिये गदगद होंगे कि बगैर सिंधिया की मदद के वे अपनी सरकार को मैजिक नम्बर से एक कदम दूर तक लाने में सफल रहे है रणनीतिक रूप से कमलनाथ के लिये दिग्गिराजा का साथ सिंधिया की तुलना में फिलहाल तो मुफीद ही साबित हो रहा है।
