छतरपुर। उत्तरप्रदेश में रहने वाला एक प्रवासी मजदूर ने अपनी पत्नी और तीन बच्चों को रिक्शा पर बैठाकर 800 से अधिक किलोमीटर का सफ़र तय किया। पंजाब में मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे मजदूर को मकान मालिक ने किराया ना देने पर घर से निकाल दिया था। ऐसे में मजदूर को मजबूरी में अपने परिवार के साथ रिक्शे पर गाँव के लिए निकलना पड़ा।
दरअसल उत्तर प्रदेश के बंदा जिले सिमरिया गॉव का रहने वाला लखनलाल अपनी पत्नी सुनीता और तीन बच्चों को सामान ढोने वाले रिक्शे पर बैठाकर पंजाब से छतरपुर जिले के हरपालपुर पहुंचा। वह रिक्शे से अपने गाँव सिमरिया जा रहा था। लखनलाल लगातार सात दिनों से रिक्शा चलाकर पंजाब के मानसा से 838 किलोमीटर सफ़र तय करके हरपालपुर पहुंचा। तपती धूप से बच्चों को बचाने के लिये रिक्शे में बच्चों को चादर उड़ा कर रिक्शे पर छाया का इंतजाम किया।
प्रवासी मजदूर लखनलाल ने अपना दर्द बयां करते हुये बताया कि रास्ते के लिये राशन तो रख लिया था, लेकिन रास्ते में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। रास्ते में कहीं खाने-पीने का इंतजाम नहीं मिला। गुड़गांव पुलिस का बर्ताव अच्छा नहीं लगा। रास्ता पूछने पर गलत रास्ता बताया, जिससे बहुत परेशानी हुई। बच्चों के लिए दूध नहीं मिला, मजबूरी में दूध की जगह पानी पिलाते रहे। जब मजदूर परिवार हरपालपुर पहुंचा तो मीडियाकर्मियों द्वारा मजदूर परिवार फल बिस्कुट एवं दूध देकर मदद की गई।
लखनलाल ने बताया जब उसने पंजाब से घर वापसी के लिये यूपी सरकार के 112 टोल फ्री नम्बर सहित 139 पर फ़ोन लगाया लेकिन घर आने का कोई इंतजाम नही हुआ। इसके बाद वह परिवार को रिक्शे में बैठकर मप्र/यूपी बॉर्डर राठ रोड पहुंचा, जहां मप्र/यूपी पुलिस उस मजदूर परिवार को घर जाने के लिए वाहन के इंतजाम में लग गई है क्योंकि अभी 200 किलोमीटर तक सफर और बाकी हैं।
मजदूर ने बताया कि अब वह गांव में ही रहकर खेती-बाड़ी करेगा। पंजाब में सीसे काटने का काम करता था, जिससे वह हजार रुपया प्रतिदिन कमा कर परिवार का ख़र्चा चला रहा था। पर जितनी आमदनी थी उतना ही खर्चा था तो कुछ बचा भी नहीं पाए।
वहीँ हरपालपुर क्षेत्र के नाउपहारिया गांव निवासी एक अन्य मजदूर भी अपने 5 बच्चे और पत्नी के साथ साईकिल पर समान लाद कर अपने गाँव पहंचा। मजदूर को रास्ते में कहीं ट्रक मिल गया तो आगरा तक बैठा लिया, लेकिन उसके बाद का सफ़र पैदल ही तय किया।
दिहाड़ी मजदूर जंगली अहिरवार, उसकी पत्नी संजू अहिरवार और बच्चे सुहानी 10 वर्ष, रानी 7 वर्ष, शिवानी 15 वर्ष, कृष्णा 5 वर्ष, नंदिनी 4 वर्ष और महक 2 वर्ष ने सैकड़ो किलोमीटर का सफर पैदल ही तय किया। दिहाड़ी मजदूरी बंद होने मकान मालिकों द्वारा घर खाली कराने के कारण वापस लौटना पड़ा। मजदूर ने बताया कि मजदूरी नहीं मिलने परिवार भरण पोषण मुश्किल हो रहा था।
