नीमच। अफीम फसल वर्ष 2019-20 के लिए अफीम के पट्टे गंवाने वाले कई किसनों ने सांसदों के दिलासे और किसी संशोधन की आस में बगैर पट्टे के ही अफीम की बुआई कर दी हैं। अब यह नारकोटिक्स विभाग के लिए चुनौती बन गई है। वहीँ इससे किसानों को भी बड़ी परेशानी हो सकती है।
दरअसल अफीम फसल वर्ष 2019-20 के लिए अफीम के पट्टे बरकरार रखने की पात्रता प्रति हेक्टेयर 5.9 किलोग्राम से घटाकर 4.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर कर दी गई थी। इस बदलाव के कारण मंदसौर-नीमच और राजस्थान के लगभग 87 प्रतिशत किसानों को पुनः पट्टे की पात्रता मिल गई। लेकिन जिन 12-13 प्रतिशत किसानों के पट्टे कटे हैं, उन्होंने इसका जमकर विरोध किया। इसको ध्यान में रखते हुए क्षेत्रों के सांसद सीपी जोशी, सुधीर गुप्ता और दुष्यंत सिंह ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वित्त राज्य मंत्री अनुरागसिंह ठाकुर से मुलाक़ात की।
सांसदों ने मांग की है कि पट्टे की पात्रता के लिए तय 4.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर को घटाकर 3.5 से 4 किलो के बीच किया जाए। ताकि अधिक से अधिक किसान पट्टे प्राप्त कर सके। सांसदों की ओर से किसानों को हर बार सकारात्मक बदलाव का भरोसा दिलाया गया। कुछ समाचार माध्यमों में तो मार्फिन की मात्रा घटाने को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप का उल्लेख करते हुए निर्णायक रूप से बताया गया कि पात्रता कसौटी में बदलाव का नोटिफिकेशन आ ही रहा है।
इससे किसानों के बीच यह धारणा प्रबल हो गई कि पात्रता औसत 4 किलो तक हो जाएगी और उनका पट्टा तय है। इस भ्रम से उपजी आस के प्रभाव को लेकर मध्यप्रदेश तथा राजस्थान के अफीम उत्पादक गांवों से जो सूचनाएं उभर रही है, वह फिलहाल तो चिंताजनक है। सार यह है कि दोनों राज्यों में यह मानते हुए कि अफीम नीति में उनके अनुकूल संशोधन हो जाएगा, सैकडों किसानों ने 6-6 आरी क्षेत्र में अफीम की बुवाई कर दी है। इस बारे में न केवल सूचनाएं नारकोटिक्स विभाग तक पहुंच रही है बल्कि किसानों के जत्थे क्षेत्रों के संबंध सांसदों को भी इस स्थिति से अवगत करवा कर मांग कर रहे हैं कि नीति में अविलम्ब अनुकूल बदलाव घोषित करें ताकि उनका पट्टा वैध रह सके।
यह चर्चाएं अगर यथार्थ के धरातल पर खरी है तो बहुत संगीन स्थिति है क्योंकि अभी तक अफीम नीति में कोई संशोधन सामने नहीं आया है। ऐसे में बगैर लाइसेंस के अफीम बुवाई का अगर कोई मामला है तो वह सीधे-सीधे एनडीपीएस के तहत अवैध कृत्य के दायरे में माना जाएगा और कहने की जरूरत नहीं कि ऐसा होने पर संबद्ध किसानों के लिए कितनी बडी परेशानी होगी। इस प्रकार की सूचनाओं के चलते केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अविलम्ब सघन जांच अभियान चलाए और किसानों को समझाए कि जब तक नीति में जरूरी बदलाव होकर उनको पट्टा नहीं मिले तब तक वह बुवाई के कृत्य से दूर रहे।
दूसरी ओर अफीम उत्पादक क्षेत्रों के सांसदों को भी इस प्रकार की सूचनाओं को गंभीरता से लेते हुए प्राथमिकता के साथ केंद्रीय वित्तमंत्री से भेंट कर एक-दो दिन में ही यह स्थिति स्पष्ट करना चाहिए कि अफीम नीति में पट्टे की पात्रता संबंधी कोई बदलाव होगा या नहीं होगा। अगर होगा तो उसका लाभ इसी वर्ष से मिलेगा या अगले वर्ष से मिलेगा। अगर कोई संशोधन नहीं होना है तो यह भी स्पष्ट करते हुए अगर कुछ किसानों ने भ्रमवश अफीम बुवाई कर दी है तो उनको अविलम्ब नियमानुसार समाधान की सुविधा दिलाई जाना चाहिए।
