उमरिया। बाघों के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए केंद्र सरकार टाइगर कॉरिडोर विकसित करने का काम कर रही है। इसकी शुरुआत मध्य प्रदेश के दो बड़े टाइगर रिजर्व बांधवगढ़ और संजय को जोड़ने से की जा रही है। इसके तहत बिगड़े वनों में पौधरोपण कर जंगली गलियारा बनाया जाएगा। ऐसा करने से बाघों को आवास की समस्या से निजात मिलेगी। हालाँकि इस पहल को सफल बनाने के लिए कॉरिडोर में शिकारियों की दखल को रोकना प्रबंधन के सामने बड़ी चुनौती होगी।
दरअसल इस समय पूरी दुनिया में बाघों के संरक्षण के लिए कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भी बाघ संरक्षण के लिए देश के 51 टाइगर रिजर्वों में टाइगर कॉरिडोर विकसित करने का काम कर रहा है। इसकी शुरुआत बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और संजय टाइगर रिजर्व के बीच की गई है। टाइगर कॉरिडोर बनाने के लिए बिगड़े वनों के सुधार एवं पौधरोपण कर वनों को सघन बनाने का काम किया जा रहा है। इसके लिए शहडोल वन वृत्त के उत्तर दक्षिण अनुपपुर एवं उमरिया वनमंडल को शामिल किया गया है। इस योजना की ख़ास बात यह है कि टाइगर कॉरिडोर बन जाने से बाघों का आवागमन दूसरे वन क्षेत्रों में हो सकेगा। जीन एक्सचेंज से बाघों का अस्तित्व लंबे समय तक बढ़ाया जा सकेगा। हालाँकि वन्य जीव विशेषज्ञ इस पहल को लेकर बाघों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश बाघ संरक्षण के मामले में देश में अव्वल रहा है। साल 2018 की गणना में देश में 2967 बाघ थे, जिसमें मध्यप्रदेश में कुल 526 बाघ मौजूद हैं। मध्यप्रदेश में टाइगर कॉरिडोर विकसित करने की पहल वन विभाग और कॉर्बेट फाउंडेशन की संयुक्त मदद से की गई है। पार्क प्रबंधन का दावा है कि जंगलों के बीच बढ़ते मानव जनित समस्याओं के कारण वन्य जीवों का विचरण बाधित हुआ है। टाइगर कॉरिडोर बनने से वन्य जीवों का विचरण क्षेत्र बढ़ेगा और उनके अस्तित्व को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिलेगी।
बाघों का आवास बढ़ाने और अस्तित्व बचाने के बांधवगढ़ से शुरू किया गया यह प्रयास कितना कारगर साबित होगा यह तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के लिए यह शुरुआत अच्छी मानी जा रही है क्योंकि यहां बाघों का घनत्व दुनिया भर में सबसे ज्यादा है और प्रजनन दर भी।
