झाबुआ। मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य इलाके झाबुआ में रोजगार के नए आयाम स्थापित किए जा रहे हैं। आईआईएम और आईआईटी की तर्ज पर यहां के छोटे-छोटे बच्चों को 6 साल में 10 हजार घंटे हस्तकला की ट्रेनिंग देकर स्वावलंबी बनाया जा रहा है। यह बीडा इलाके में काम करने वाली संस्था शिवगंगा कर रही है।
झाबुआ जिले में काम नहीं होने से बडी तादात में आदिवासी दूसरे शहरों या राज्यों में जाते हैं। इलाके में कई सालों से आदिवासियों के सर्वांगिण विकास के लिए काम कर रही शिवगंगा ने रोजगार के लिए खास अभियान शुरु किया है। शिवगंगा ने झाबुआ जिले के मेघनगर में एक ट्रेनिंग इंस्टीट्युट शुरू किया है। यहां इलाके के आदिवासी बच्चों को तराशा जा रहा है। बांस से कई तरह की खास वस्तुएं बनाई जा रही है। बांस से घरों को सुसज्जित करने वाली सामग्रियों सहित बहुपयोगी वस्तुएं बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। चौबिस घंटे बच्चों को यहीं होस्टल में रखा जाता है। बच्चे अपनी स्कूली शिक्षा के साथ बाकी वक्त में हस्तशिल्प की ट्रेनिंग लेते हैं।
शिवगंगा झाबुआ के प्रमुख महेश शर्मा के मुताबिक आदिवासी बाहुल्य इस क्षेत्र में 40 हजार परिवारों तक रोजगार पंहुचाने की यह महती योजना है। इसमें हर घर से एक बच्चे को बांस से हस्तशिल्प का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कोशिश है कि प्रशिक्षित लोग इसे अपनी आजीविका के तौर पर इस्तेमाल करेंगे जिससे उन्हें रोजगार सुलभ होगा। प्रशिक्षण की अवधी 6 साल में 10 हजार घंटे होंगे। इस समयावधि में सैकडों तरह का शिल्प बनाना सिखाया जाएगा। यह ट्रेनिंग उसी तरह कि है जिस तरह आईआईएम और आईआईटी की होती है। बच्चों में नियमित पढाई के अलावा शुरु से एक हुनर होगा तो उनका भविष्य सुरक्षित रह सकेगा।
मेघनगर केन्द्र के प्रभारी शंकर सिंह का कहना है कि फिलहाल उनके यहां 25 बच्चे हैं जो मास्टर ट्रेनर के तौर पर काम सीख रहे हैं। उन्हें फिलहाल औजार पकडने और उन्हें चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। बच्चों को इस काम में मजा आ रहा है। अभी हम लेम्प और एम्पलीफायर बनाना सीखा रहे हैं। अहम बात यह है कि बच्चों ने कम समय में ही दोनों आइटम बनाना सीख लिया है। इसकी पैकेजिंग कर बिक्री के लिए तैयार भी हो चुके हैं। इस हस्तकला का नाम ‘झाबुआ क्रॉफ्ट’ रखा गया है। झाबुआ क्रॉफ्ट के नाम का ब्रॉण्ड धीरे-धीरे मशहूर हो रहा है। इसकी बिक्री के लिए ऑर्डर भी मिलने लगे हैं।
