अलीराजपुर। आदिवासी बहुल इलाके में रहने वाली एक महिला ने अपनी मेहनत और सूझबूझ से अपने परिवार की तकदीर बदल दी है। अपने पति के साथ मजदूरी करके गुजारा करने वाली महिला ने मजदूरी छोड़ जैविक खेती करने की ठानी। इसके लिए जैविक खेती और औषधि बनाने की ट्रेनिंग ली। इसके बाद अपने पति के साथ जैविक खेती करना शुरू किया। फसल पर छिड़काव करने के लिए दवा खुद बनाई। आज महिला अपने परिवार के साथ गाँव के कई परिवारों की जिन्दगी में सकारात्मक बदलाव लेकर आई है।
गुजरात से सटे हुए अलीराजपुर जिले के छोटे से गाँव जावरा की रहने वाली बदली बाई ने महिला सशक्तिकरण का नया उदहारण पेश किया है। बदली बाई अपने पति के साथ गुजरात में मजदूरी किया करती थी। साल 2015 में वह वापस जावरा आ गई और आजीविका के समूह से जुड़ गई। बदली बाई ने जैविक खेती करने की ठानी। उसने अपनी आजीविका की मदद से जैविक खेती करना सीखा। उसने अपने पति बांग्ला को भी जैविक खेती के फायदे समझाए। इसके बाद दोनों पति-पत्नी जैविक खेती करने लगे। बदली बाई ने फसल पर छिड़काव के लिए पत्तों से औषधि बनाई। इससे उनकी फसल को काफी फायदा हुआ। खेत में सब्जी और फल से अच्छा मुनाफा होने लगा। धीरे-धीरे उनके परिवार की तकदीर बदलने लगी।
आज बदली बाई का एक लड़का दिल्ली में पढ़ाई कर रहा है। उसने नीट की परीक्षा पास कर ली है। वहीं चार बेटे उसके पुणे में नौकरी कर रहे हैं। बदली बाई ने अपने परिवार, बच्चों की तकदीर सवारने के साथ-साथ गांव की भी तकदीर सुधारना शुरू कर दिया है। बदली बाई ने गाँव के लोगों को जैविक खेती करना सीखना शुरू किया। वहीं गाँव के बेरोजगार युवाओं को समझा कर नौकरी में लगवाया। इसका असर यह हुआ कि आज गाँव के 16 से ज्यादा युवा पुणे में नौकरी कर रहे हैं। बदली बाई का यह काम निरंतर जारी है। वह आज भी घर से लोगों को प्रेरित करने निकल जाती है। गांव के लिए आज बदली बाई मदर इंडिया से कम नहीं है।
