उमरिया। एक अनपढ़ आदिवासी महिला जिसने 60 साल की उम्र में ब्रश पकड़ने की शुरुआत की। वह महज 20 साल में ही अंतराष्ट्रीय कलाकार बन गई है। उसने कैनवास पर ऐसे चित्र उकेरे कि आज उसके चित्र मशहूर चित्रकार लियोनार्दो द विंची के देश इटली में रंग बिखेर रहे हैं।
हम बात कर रहे है उमरिया जिले के छोटे से गाँव लोढ़ा में रहने वाली आदिवासी महिला जोधईया बाई बैगा की। उनके द्वारा बनाए गए चित्रों को इटली के मिलान शहर में आयोजित प्रदर्शनी में दिखाया जा रहा है। प्रदर्शनी 11 अक्टूबर तक चलेगी। जोधईया बाई के चित्रों की धाक ऐसी है कि प्रदर्शनी के आमंत्रण पत्र के कव्हर पेज भी उनकी पेंटिंग से रंगा हुआ था। प्रदर्शनी में दुनिया के बड़े-बड़े चित्रकार और अन्य लोग जोधईया बाई की पेंटिंग का दीदार किया । जोधईया बाई की इस उपलब्धि के लिए जिला प्रशासन ने जोधइया बाई का सम्मान किया है।
कला ने भले ही जोधईया बाई को भले ही अंतर्राष्ट्रीय कलाकार बना दिया हो लेकिन वह आज भी अपने हालात तक सीमित है। जोधईया बाई को इटली का नाम भी सिर्फ इसलिए पता है क्यों कि सोनिया गाँधी वहीँ की रहने वाली है। 80 वर्ष के उम्र में जहाँ लोगों की उम्मीद टूटने लगती हैं वहीँ जोधईया बाई की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की उड़ान इस उम्र में शुरू हुई है। ख़ास बात यह है कि इसके लिए जोधईया बाई ने किसी तरह की कोशिश नहीं की बल्कि उनकी कलाकृतियों से प्रभावित होकर लोगों ने उसे वहां तक पहुंचा दिया।
जोधईया बाई की कलाकृतियां इससे पहले मध्यप्रदेश के जनजातीय संग्रहालय, शांति निकेतन, नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा, मानस संग्रहालय में भी सम्मानित हो चुकी है। इसके अलावा कई विदेशी भी उनके लोकचित्र के कद्रदान है।
गाँव में रहने वाली बिना पढ़ी लिखी एक बुजुर्ग महिला को देश विदेश में ख्याति दिलाने का श्रेय जोधईया बाई के गुरु चित्रकार आशीष स्वामी गुरुदेव को जाता है। आशीष स्वामी गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित शांति निकेतन कला एवं संगीत विश्वविद्यालय से चित्रकला में स्नातक हैं। साल 2008 में आशीष स्वामी ने ग्राम लोढ़ा में जनगण तस्वीरख़ाना की स्थापना की थी। यहाँ उन्होंने विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी बैगा जनजातीय कला संस्कृति के संरक्षण के लिए बैगा समाज के दर्जन भर लोगों को चित्रकला का पाठ पाठ पढ़ाना शुरू किया। आशीष स्वामी ने महज दस सालों में बेकारी और गरीबी से जूझ रहे बैगा परिवारों को चित्रकार बनाकर न सिर्फ समाज की मुख्य धारा में जोड़ा बल्कि इनके लिए रोजगार और आजीविका के रास्ते भी खोल दिए।
इन्हीं लोगों में से एक जोधईया बाई भी है। महज तीस साल की उम्र में पति की मौत के बाद बच्चों को पालने की मज़बूरी में जोधईया बाई ने आशीष स्वामी के सम्पर्क में आने के बाद हाथ में ब्रश थमा था। आज जोधईया बाई ने अपनी कला का ना सिर्फ दुनिया में लोहा मनवाया बल्कि बैगा चित्रकला को भी नया जीवन दे दिया है।
आशीष स्वामी बैगा आर्ट को गोंड पेंटिंग की तर्ज पर पुरे देश और दुनिया में फैलाना चाहते हैं। जनजातीय मामलों के जानकार भी मानते हैं कि आदिवासी समाज में कला समृद्ध रही हैं लेकिन संरक्षण के अभाव में यह कला खोती गई। जानकारों ने आदिवासी कला संस्कृति के विस्तार के लिए सरकार से मदद मांगी है।
