नरसिंहपुर। मिट्टी को आकार देकर हमारे घरों को रोशन करने वाले कुम्हारों के खुद के घर अँधेरे में डूबे हुए हैं। बाजार में आर्टिफिशियल और चाइनीज सजावटी वस्तुओं का बोलबाला है। इस कारण कुम्हारों को न उनकी मेहनत का सही दाम मिलता है और न ही विक्रय के लिए उचित बाजार। यहीं कारण है कि अब बड़ी संख्या में कुम्हार परंपरागत व्यवसाय से पलायन करने लगे हैं।
‘दीया तले अंधेरा की कहावत’ दीया बनाने वाले पर सटीक बैठ रही है। तंगहाली में जीवन जीने वाले कुम्हारों को न शासन से कभी अनुदान मिलता है न सरकारी मदद। कुम्हारों का कहना है कि पहले प्रशासन मिट्टी की व्यवस्था करता था लेकिन पिछले कई सालों से वह भी बंद हो गया है।
अब किसानों को खेत मालिकों से मिट्टी मोल लेनी पड़ती। इससे मिट्टी के बर्तन बनाने में लागत बढ़ने लगी और बाजारवाद के कारण मुनाफ़ा घटने लगा। विदेशी वस्तुएं भले ही ईको फ्रेंडली न हो और न ही उनमें भावनात्मक भाव हो मगर चमक धमक के चलते लोग उन्हें ही पसंद कर रहे हैं। इस कारण अब कई कुम्हारों को मज़बूरी में अपना पुश्तैनी व्यवसाय छोड़ना पड़ रहा हैं।
सात्विकता और मिट्टी की महक से चमकते हुए इन दोनों का भले ही आर्टिफिसियल के जमाने में मोल न रह गया हो लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से यह अनमोल है। बावजूद इसके अब बाजारों में इनकी पूछ परख नहीं होती है। बेचने वाले भी अब मजबूरन बाजार की मांग की वजह से आर्टिफिशयल सजावटी सामान बेचने को मजबूर है। हालांकि फिर भी वह कहते है कि देशी तकनीक से बने मिट्टी की वस्तुओं की कोई काट नहीं मगर आजकल लोग उन्हें खरीदना कम ही पसंद करते है।
