नरसिंहपुर। हिन्दू धर्म में मृत्यु होने के बाद शव का दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन प्रदेश का एक गाँव ऐसा भी है जहाँ किसी शव की अंत्येष्टि नहीं होती। यहाँ शव को दफनाया जाता है। यहाँ मान्यता है कि गांव के अंदर शव जलाने से दैवीय प्रकोप से मौतों का सिलसिला चल पड़ता है।
दरअसल देश में गांवों में आज भी विज्ञान पर अन्धविश्वास भारी है। यहाँ अन्धविश्वास की जड़े इतनी गहरी है कि इक्कीसवीं सदी में भी इसकी इमारत को हिला पाना मुश्किल है। नरसिंहपुर जिले का ऐसा ही गाँव है चंद्रलौंन। आदिवासी बाहुल्य इस गाँव के किसी भी शख्स ने गाँव की सीमा के अंदर शव की अंत्येष्टि होते नहीं देखी। यहाँ मृत्यु होने के बाद शव को दफनाया जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि गाँव में शव जलाने से दैवीय प्रकोप से मौतों का सिलसिला चल पड़ता है।
चंद्रलौंन गाँव में पिछले 300 सालों से यह परम्परा चली आ रही है। स्त्री हो पुरुष हो या बच्चे सभी को गाँव की परंपरा के अनुसार दफनाया जाता है। गाँव के बुजुर्गों की माने तो गाँव में स्थित ज्वाला देवी के प्रकोप से बचने के लिए ऐसा किया जाता है।
बुजुर्ग बताते है कि उनके पूर्वजों ने एक बार किसी की मौत होने पर उसके शव को गाँव में ही अग्नि दे दी। इससे देवी नाराज हो गई और गाँव में श्रृंखलाबद्ध मौतों का सिलसिला चल पड़ा। यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक शवों को दफनाना शुरू नहीं किया। तभी से गाँव की सीमा में शव को अग्नि देने की इजाजत नहीं है। अगर कोई शव को अग्नि देना चाहता है तो उसे गाँव की सीमा छोड़नी पड़ती है।
गांव के सरपंच और सचिव भी कहते है कि वर्षों पुरानी परंपरा को तोड़ना किसी के बस की बात नही है। गांव में अग्नि देना प्रतिबंधित है और यदि कोई अग्नि संस्कार करना चाहता है तो उसे गांव के बाहर जाकर ही ये संस्कार निभाने पड़ते है। हालांकि प्रशासन ने दो साल पूर्व गांव में मुक्ति धाम तो बनाया पर तब से अब तक लगभग 10 मौत हो चुकी है। पहले शव को जलाने के बाद फिर किसी ने शव को जलाने की हिम्मत नहीं की।
