सतना। प्रदेश के गौंड आदिवासी समुदाय के लोग आज भी आपसी विवाद कोर्ट-कचहरी के जरिए नहीं बल्कि मिल बैठकर ही सुलझाते हैं। इसके लिए समुदाय के लोगों द्वारा महापंचायत लगाई जाती है। इसमें सामाजिक और पारिवारिक झगड़े विवाद आदि निपटाए जाते है। हत्या, दुष्कर्म जैसे मामलों को छोड़ दे तो अन्य सामान्य मामलों को निपटाने के लिए आदिवासी पुलिस व सरकारी न्यायिक व्यवस्था के आश्रित नही होते है। ख़ास बात यह है कि महापंचायत का जो भी फैसला होता है, वह सभी को मान्य होता है।
सतना जिले के उचेहरा विकास खण्ड मुख्यालय से लगभग 35-40 किलोमीटर दूर परसमनिया पठार और श्यामगिरि कल्दा पठार के बीच एक छोटा सा आदिवासी गाँव है आलमपुर। गाँव में 9 फरवरी 2020 को पूर्णमासी के दिन तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाएगा। मेले में आदिवासियों की महापंचायत भी लगेगी। महापंचायत में सतना, रीवा, पन्ना, कटनी, जबलपुर, मंडला सहित अन्य जिलों के गौंड आदिवासी समुदाय के लोग शिरकत करेंगे। महापंचायत में सामाजिक और पारिवारिक विवाद आदि निपटाए जाएँगे।
दरअसल गोंडवाना महासभा का आयोजन पिछले 70-75 वर्षों से होता चला आ रहा है। हर साल माघ की पूर्णिमा पर तीन दिवसीय मेले और महापंचायत का आयोजन किया जाता है। इसमें सामाजिक और पारिवारिक विवाद, विधवा विवाह को बढ़ावा देने, जल जंगल जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधन का संरक्षण व बाल विवाह, दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों को मिटाने पर भी चर्चा होती है। हत्या, दुष्कर्म जैसे मामलों को छोड़ अन्य सभी सामान्य मामलों का निपटारा महापंचायत में किया जाता है। खास बात यह है कि महापंचायत का फैसला पक्ष में आए या विपक्ष में, सभी को मान्य होता है।
जहाँ पर महापंचायत लगती है वहां पर एक बहुत बड़ा चबूतरा है। चबूतरे के समीप ही एक पवित्र पत्थर के रूप में गोंड समुदाय के आदि देवता भगवान बड़ादेव स्थापित है। भगवान बड़ादेव में गोंड समुदाय के लोगों की गहरी आस्था है। तीन दिवसीय मेले के दौरान हर वर्ष गोंडी पुराण का वाचन भी होता है। यह मराठी गोंडी मिश्रित भाषा का पवित्र ग्रन्थ है। इसके वाचन के लिए महाराष्ट्र के विद्वान बुलाये जाते है जो मूल पाठ के साथ हिंदी में अनुवाद भी करते जाते है। इस मेले में आदिवासी महिला व पुरुष अपने परंपरागत परिधान में आते है। कुछ लोग तो अपनी हस्त निर्मित कला कृतियाँ भी लाते हैं।
