देवास। कुछ ही दिनों में होली का त्यौहार आने वाला है, जबकि अब तक बागली क्षेत्र के वन में प्राकृतिक रूप से रंग बनाने वाले टेसू के फूल नजर नहीं आ रहे हैं। टेसू के फूल से बने रंगों से होली खेलने पर कोई नुकसान नहीं होता है। पहले ग्रामीण टेसू के फूल से बने रंग से ही होली खेलते थे, लेकिन अब होली करीब आ गई पर यह फूल कहीं नहीं दिखाई दे रहे हैं।
दरअसल एक समय था जब होली से पहले देवास के बागली क्षेत्र के वनांचल टेसू के फूल हर स्थान पर दिखाई देते थे। टेसू के फूल को गर्म पानी में उबालकर हर्बल रंग बनाए जाते थे। क्षेत्र के ग्रामीण हर्बल रंग से ही होली खेलते थे। रासायनिक रंगों का उपयोग लोग जानते नहीं थे। ग्रामीण होली से दो दिन पहले ही आसपास के वनों में लगे टेसू के फूल तोड़कर ले आते थे। इसके बाद इन फूल को बड़े पानी के बर्तनों में गर्म करके रंग बनाकर होली खेलते थे। टेसू के फूल से बना रंग अगर गलती से मुंह में भी चला जाए तो स्वास्थ्य को नुकसान नहीं होता था।
1980 के दशक तक यह परिपाटी ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार बनी हुई थी। लेकिन अब प्रकृति में यह फूल कहीं नहीं दिखाई दे रहे हैं। इस संबंध में वनस्पति विज्ञान से जुड़े पूर्व कृषि विस्तार अधिकारी ने बताया कि वर्षों बाद बारिश का मौसम नवंबर माह तक चला गया है। इसके चलते प्रकृति 1 माह से अधिक बिछड़ गई है। वनों में पतझड़ अभी शुरू नहीं हुआ जबकि पहले मार्च के प्रथम सप्ताह में पतझड़ पूरी तरह शुरू हो जाता था। अब टेसू के फूल अप्रैल-मई माह में ही खिल पाएंगे। यह बात उचित है कि उससे बने रंग से कोई भी नुकसान नहीं रहता है। यह रंग त्वचा के लिए भी फायदेमंद है।
