देवास। यह आंगनवाड़ी कार्यकर्ता प्रमिला ठाकुर का जज्बा ही था कि आज तीन वर्षीय आकाश अपनी आँखों से दुनिया देख रहा है। प्रमिला ठाकुर ने जैसे-तैसे आकाश के माता-पिता को इलाज के लिए मनाया, उन्हें अपनी जेब से एक दिन की मजदूरी दी और सरकारी मदद से आकाश की आँखों का इलाज करवाया। आकाश का इलाज सरकारी मदद से होने से घर के सभी लोग बहुत खुश हैं और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व शासन का धन्यवाद कर रहे हैं।
दरअसल देवास जिले के बागली अनुभाग से 13 किमी दूरी पर स्थित ग्राम भमोरी के आदिवासी परिवार में तीन साल पहले आकाश पिता मुकेश का जन्म हुआ था। आकाश को जन्म से ही आंखों से दिखता नहीं था, लेकिन उसके चंचल स्वभाव के कारण माता-पिता को इसका अहसास ही नहीं हुआ। लगभग 8 माह बाद जब बच्चा नियमित रूप से आंगनवाड़ी जाने लगा तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता प्रमिला ठाकुर को अहसास हुआ कि आकाश वस्तुओं की पहचान उन्हें देखकर नहीं बल्कि छूकर करता है।
जब यह बात आंगनवाड़ी कार्यकर्ता प्रमिला ने आकाश के माता-पिता को बताई तो वह नाराज हो गए और बच्चे को भेजना ही बंद कर दिया। करीब 15-20 दिन प्रमिला ने घर जाकर परिजनों को समझाया लेकिन परिजन संतुष्ट नहीं हुए। परिजनों ने चुपचाप बच्चे को इंदौर के निजी अस्पताल में दिखाया जहाँ बच्चे की आँख की बीमारी की पुष्टि हुई। अस्पताल ने बच्चे की आँख का इलाज करने में एक से डेढ़ लाख रुपए कर खर्च बताया। रोजनदारी से मजदूरी करने वाला परिवार इतना रुपया नहीं होने के कारण वापस घर आ गया।
इस बीच प्रमिला आकाश के माता-पिता को सरकारी अस्पताल में दिखाने व मुफ्त इलाज के लिये समझाती रही, लेकिन प्रतिदिन मजदूरी कर घर चलाने वाले परिजन रोज-रोज दिन ख़राब करने और डॉक्टरों के चक्कर लगाने की बात कहकर टालते रहे। आखिर में प्रमिला ने स्वयं अपनी जेब से आकाश के माता-पिता को प्रतिदिन एक दिन की मजदूरी दी और आकाश को लेकर बागली के अस्पताल लेकर पहुंची। यहाँ आकाश का प्राथमिक ईलाज व कागजी खानापूर्ति होने के बाद बच्चे के इलाज के लिए राशी स्वीकृत कराई। राशी स्वीकृत होने के बाद इंदौर के टी चोइथराम में आकाश का सफल इलाज हुआ। आकाश का इलाज सरकारी मदद से होने से घर के सभी लोग बहुत खुश हैं और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व शासन का धन्यवाद कर रहे हैं।
