इंदौर। तराशे गए पत्थरों से बने पहाड आज भी अबूझ पहेली बने हुए हैं। इन पहाड़ों को देखकर आप हैरान रह जाएगें। हजारों लाखों तराशे गए पत्थरों से भरे इन पहाडों को देख ऐसा लगता है मानों किसी ने इन्हें तराश कर जमा दिए हों। इन पहाड़ों को देखकर मन रोमांच से भर जाता है। भले ही इलाके में इन पहाड़ों को लेकर किंवदंतियां प्रचलित हों मगर विज्ञान के अपने तर्क हैं।
इंदौर से करीब 100 किलोमीटर दूर देवास जिले के अंति छौर पर पोटला गाँव के जंगलों में ऐसे रहस्यमयी पहाड़ हैं जिन्हें देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। कावड़िया पहाड़ तराशे गए (अष्टभुजी करीब 30 फुट ऊँचाई) पत्थरों का स्वनिर्मित ऐसा पहाड़ है, जहाँ हजारों की तादाद में एक ही आकार के पत्थर जमे हुए हैं। यह अपनी तरह की अनूठी भूवैज्ञानिक संरचनाएँ हैं। पूरी दुनिया में ऐसी आकृतियाँ केवल दक्षिण अफ्रीका और भारत में यहाँ ही मिलती है। दक्षिण अफ्रीका ने इन्हें पर्यटन और शोध की दृष्टि से काफी विकसित किया है। लेकिन हमारे यहाँ अब तक उपेक्षित ही रहे हैं। बताया जाता है कि किसी बड़े ज्वालामुखी के लावा शान्त होने से ऐसी आकृतियों के पत्थर बने हैं।
यहाँ सारे पत्थर एक ही आकार–प्रकार के होने के बाद भी उनकी अंदरूनी संरचना भिन्न है। सम्भवतः इसीलिये यहाँ के हर पत्थर को अन्य पत्थर या लोहे से ठोकने पर इनकी अलग–अलग ध्वनि आती है। यह ध्वनि संगीत के सात सुरों की तरह है। इसे लेकर कई पुरातत्ववेत्ताओं ने यहाँ शोध भी किया है। लेकिन अभी तक कोई बड़ी जानकारी सामने नहीं आ पाई है। इन्हें लेकर यहाँ कई तरह की स्थानीय किवदन्तियाँ भी हैं।
स्थानीय निवासी गिरधर गुप्ता बताते हैं- ‘यह स्थान बहुत दुर्लभ है। वैज्ञानिक के मुताबिक ज्वालामुखी की वजह से ऐसा हुआ है तो इसके विशद शोध की दरकार है ताकि इसकी प्राचीनता का पता लगाया जा सके। लोगों में किवदन्ती है कि भीम नर्मदा नदी से शादी करना चाहता था। नर्मदा ने भीम को चुनौती दी कि मैं तो प्रारम्भ से ही कुँआरी नदी हूँ। लेकिन यदि तुम एक ही रात में मुझे बाँध सके तो मुझे तुमसे शादी का प्रस्ताव मंजूर होगा। भीम ने नर्मदा नदी को बाँधने के लिये ही इन पत्थरों को अपनी कावड़ में भरकर यहाँ लाया था। लेकिन सुबह हो जाने से ये पत्थर यहीं रखे रह गए और नर्मदा अब तक चिर कुँआरी नदी ही बनी रही। अब इस किवदन्ती में कितनी सच्ची है, नहीं कह सकते। पर इलाके में लोग यही मानते हैं। इसीलिये इसे कावड़िया पहाड़ के नाम से पहचाना जाता है।’
कावड़िया पहाड के विकास और पर्यटन को विकसित करने के लिए सरकारों का बेहद सुस्त रवैया रहा है। यहां तक कि इन पहाड़ों तक पंहुचने के लिए रास्ता भी नहीं है। पहड़ों पर से इन तराशे गए पत्थरों को लोग ले जा रहे हैं कुछ साल पहले पहाड़ों के आसपास तार फेंसिंग के लिए पोल गाड़े गए थे लेकिन इन पर भी अब तार नहीं है।
इसके आसपास सागौन के बड़े क्षेत्र में विस्तृत घना जंगल है। अब तक मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रहने की वजह से इस इलाके का यथोचित विकास नहीं हो पाया है। इलाके में पर्यटन के लिये महत्त्वपूर्ण वन, नदी और पहाड़ों की शृंखला होने के बाद भी कभी इस क्षेत्र में कभी कोई पर्यटन गतिविधि नहीं रही। आसपास करीब 25 किमी इलाके में सिर्फ भील–भिलाला बाहुल्य क्षेत्र ही है।
इन आदिवासियों की मुख्य आजीविका भी इन्हीं जंगलों के सहारे चलती रही है। नर्मदा नदी होने के बाद भी इस क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं का भारी अभाव रहा है। इलाके में बेहद गरीबी है यदि यहां पर्यटन को बढावा मिलेगा तो स्थानीय लोगों को भी आजीविका के साधन मिल सकेंगे।
