झाबुआ। कल्पना कीजिए ऐसी जगह की, जहाँ हरियाली की चादर ओढे ऊँची-नीची पहाडियों की साफ सुथरी आबोहवा वाली सुरम्य वादियाँ बीच-बीच में जंगल की नीरवता को तोड़ती हुई पक्षियों की चहचहाहट और बहते हुए पानी की कल-कल, छल-छल आवाज़। या रात की दूधिया रोशनी में चुल्हे पर सिंकती मक्का की रोटियाँ, गुड और पत्थर के सिलबट्टे पर पिसी हुई लहसुन की चटनी, खट्टी-मीठी दाल या स्वादिष्ट दाल-पानिये का मुँह में घुलता स्वाद। मांदल की थाप, थाली की गूँज औऱ घुंघरुओं की खनक के बीच पूरी मस्ती में कुर्राटियाँ भरते और थिरकते आदिवासी. इस सुहाने और मस्तीभरे परिवेश में कौन न रहना चाहेगा। कुछ देर ही सही।
अब सुरम्य प्रकृति के बीच ये नज़ारे आप भी महसूस कर सकते हैं। आप भी इनका हिस्सा बन सकते हैं। आप यहाँ रुक सकते हैं। इनकी आनन्दित जीवन शैली और समृद्ध संस्कृति को नजदीक से देख-परख सकते हैं। पूरी दुनिया में अपनी तरह की अनूठी ज़िंदगी बिताने वाले आदिवासियों को लेकर हमेशा से ही एक ख़ासा रोमांच और कौतुहल रहता है।
मध्यप्रदेश की सरकार ने अब इसे प्रयत्न से जोड़ते हुए इस अनूठी दुनिया के द्वार सैलानियों के लिए खोलने की पूरी तैयारी कर ली है। झाबुआ जिले के गाँवों में हर साल हजारों पर्यटक पहुँचते हैं। कुछ विदेशी सैलानी तो कई हफ़्तों या महीनों तक यहाँ रूककर इस आदिम सभ्यता और संस्कृति को जानने का यत्न करते रहते हैं। इन्हीं पर्यटकों को आकर्षित कर आदिवासी अंचल में स्थानीय रोज़गार को बढ़ावा देने की कोशिशें अब तेज़ हो गई हैं। ये गाँव इस अनूठी मेजबानी के लिए तैयार हो रहे हैं।
अब झाबुआ के आदिवासी फलियों में आदिवासी परिवारों के बीच आप कुछ दिन रह कर उन्हें करीब से जान सकते हैं। उन्ही के हाथों से बने पारंपरिक खाने का जायका भी ले सकते हैं। आदिवासियों के पारंपरिक लोक नृत्यों को देख ही नहीं बल्कि आप खुद भी उसमें शामिल हो सकते हैं। अपने पारंपरिक संगीत और वेशभूषा के साथ नाच-गा रहे आदिवासियों की मस्ती पूरे शबाब पर है। लोक गीतों के साथ महिला-पुरुषों की कमदताल मन को रोमांच से भर देती है। रूरल होम-स्टे के लिए चयनित खेडा गांव की चौपाल पर शाम ढलने के बाद आदिवासी अपनी मस्ती में डूब जाते हैं।
खेड़ा गाँव झाबुआ से 30 किलोमीटर दूर खूबसूरत पहाडियों के बीच बसा हुआ है। देसी-विदेशी मेहमानों की मेजबानी के लिए गाँव को खास तरह से तैयार किया जा रहा है। आदिवासियों के जल जंगल, जमीन बचाने के लिए काम करने वाली संस्था शिवगंगा इन गांवों में आदिवासियों को खास तौर पर ट्रेनिंग दे रही है। सरकार की कोशिश है कि इन गाँवों में ही ऐसे संसाधन और सुविधाएँ मुहैया कराई जाएँ जिनसे पर्यटक यहाँ गाँव की ज़िंदगी के बीच रहकर अध्ययन या भ्रमण कर सकें। इस उपक्रम का उद्देश्य है पर्यावरण और सांस्कृतिक पर्यटन के माध्यम से देश और सुदूर विदेशों के लोगों को आदिवासी गाँवों की समृद्ध संस्कृति और अनुकरणीय जीवन मूल्यों से अवगत कराना। इसी क्रम में खेड़ा और छागोला गाँवों में ‘रूरल होमस्टे’ को विकसित किया जा रहा है। इसको बेहतर ढंग से करने के लिए सामाजिक नेतृत्व कर रहे हैं खेड़ा गाँव से दरियावसिंह भाबर और छागोला से हरिसिंह सिंघार के साथ नितिन धाकड़, जिन्होंने मध्य प्रदेश टूरिज्म बोर्ड की वर्कशॉप में पर्यटन को बढ़ावा देने के गुर सीखे हैं।
इससे पहले यहाँ के भगोरिया सहित कुछ लोक उत्सवों में ऐसे प्रयास काफी सफल रहे हैं। यहाँ के खाद्यान्न, फल-फूल और सब्जियों को भी झाबुआ नेचुरल्स तथा चित्रकला, मूर्तिकला आदि को भी फिर से प्रकाश में लाने की भी मुहिम चल रही है। सरकार इनके ज़रिए मध्यप्रदेश में पर्यटन को विकसित करने पर जोर दे रही है।
जिले के छागोला और खेड़ा गाँव में देशी-विदेशी सैलानी इन खपरैलों वाले लीपे-पुते कच्चे-पक्के मकानों में ठहर सकेंगे। सैलानी यहाँ आदिवासियों की सभ्यता और संस्कृति को जान सकेंगे। आदिवासी इन्हें दाल-पानिये, मक्के की रोटी, लाल मिर्च और लहसुन की चटनी के साथ खास जायका भी देंगे। गौरतलब है कि विदेशी सैलानी झाबुआ की इस संस्कृति को देखने के लिए हफ्तों यहाँ गुजारते हैं। ऐसे सैलानियों के लिए होम स्टे बेहतर ढंग से कामयाब होंगे।
आदिवासी फलिए में रहते हुए सैलानी प्राकृतिक संसाधनों, उनके रहन-सहन और खान-पान को भी समझ सकेंगे। इन आदिवासी गाँवों में आज भी आदिवासी जल-जगंल और जमीन में ही रचे बसे हैं। घरों में आज भी घट्टियों पर मोटा अनाज पिसा जाता है। यहाँ आधुनिक पहनावे पर पारंपरिक पहनावा आज भी भारी है। कैसे आदिवासी तीर-कामठी और गोफन से खुद की हिफाजत करते हैं। आदिवासियों के लोकगीतों को सुनकर तो आप मंत्रमुग्ध हो जाएँगे।
शिवगंगा और मध्यप्रदेश सरकार का पर्यटन विभाग झाबुआ के होम स्टे प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। सैलानियों के रहने की मूलभुत सुविधाओं के बाद निर्धारित शुल्क देकर यहाँ सैलानी अलग तरह के पर्यटन का आनंद ले सकेंगे। जाहिर है यह शुरुआत एक अलग तरह के पर्यटन को बढ़ावा देगी।
