आगर-मालवा। यह गरीब माता-पिता की बेबसी और लाचारी ही है कि वह हर रोज अपनी 13 वर्षीय दृष्टिहीन बेटी को भगवान भरोसे घर में अकेला छोड़ने पर मजबूर है। आखिर माता-पिता करे भी तो क्या पेट की आग ही ऐसी है जिसे शाम को बुझाए तो सुबह फिर भभक उठती है। इस आग को बुझाने के लिए माता-पिता सुबह खेतों में मजदूरी करने के लिए निकल जाते हैं। बेटी को भगवान भरोसे घर में कैद कर जाना अब हर दिन की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है।
माता-पिता को हर समय किसी अनहोनी का डर बना रहता है, लेकिन गरीबी के कारण वह अपने जिगर के टुकड़े को पूरा दिन दरवाजे के पीछे कमरे में छोड़ने को मजबूर हैं। ऐसा नही है कि माता-पिता ने कोई कोशिश नही की। पिता अपनी बेटी को लेकर तमाम नेताओं और अधिकारियों की चौखट पर दस्तक दे चुके हैं लेकिन उन्हें सिवाए आश्वासन के कुछ नहीं मिला।
सरकार भले ही दिव्यांगों के लिए कई तरह की योजनाएं चलाए और उनकी सहायता के तमाम दावे करे। लेकिन जमीनी सच्चाई इसके ठीक उलट है। आगर-मालवा जिले के पांचारुण्डी में रहने वाले गंगा राम और राजू बाई की बेटी दुर्गा सूर्यवंशी बचपन से दृष्टिहीन है। गंगा राम ने अपनी बेटी के लिए मंत्री, सरपंच से लेकर कलेक्टर के दरवाजे पर दस्तक दी लेकिन हर जहाँ से उसे सिर्फ मायूसी ही हाथ लगी।
गंगा राम और राजू बाई के पास जितना भी पैसा था उससे उन्होंने अपनी बेटी को कई डॉक्टर को दिखाया। दुर्गा का शत प्रतिशत विकलांगता का प्रमाणपत्र भी बना हुआ है मगर वह केवल संदूक में रखे रहने के सिवा कोई काम नहीं आता। बेबस माँ अपनी बेटी के कागजात संदूक में सहेज कर इसलिए रखती है कि शायद कभी तो बेटी को न्याय मिलेगा। जनप्रतिनिधियों की माने तो ये मामला काफी चिंताजनक है। वे सरकार के साथ साथ अधिकारियों की उदासीनता पर भी सवालिया निशान उठाते नजर आए।
